वृद्धि और विकास के वाद विवाद

 

1.बाल विकास में प्रकृति बनाम पोषण (Nature vs Nurture)

भूमिका

बाल विकास के क्षेत्र में यह एक प्रमुख विवाद रहा है कि बच्चे के विकास में वंशानुक्रम (प्रकृति) की भूमिका अधिक होती है या पर्यावरण एवं अनुभव (पोषण) की। इसी विवाद को प्रकृति बनाम पोषण कहा जाता है।

 

1. प्रकृति (Nature) का दृष्टिकोण

प्रकृति के समर्थक यह मानते हैं कि बाल विकास मुख्य रूप से वंशानुगत गुणों पर निर्भर करता है, जो बच्चे को जन्म के समय माता–पिता से प्राप्त होते हैं।

मुख्य तर्क:

  • बुद्धि, व्यक्तित्व, शारीरिक संरचना आदि जन्मजात होते हैं।
  • विकास जैविक परिपक्वता पर आधारित होता है।
  • वातावरण की भूमिका सीमित होती है।

समर्थक विचारक:

  • चार्ल्स डार्विन
  • गैल्टन

उदाहरण:

  • आँखों का रंग, लंबाई, कुछ मानसिक क्षमताएँ।
  • कुछ बच्चे जन्म से ही तेज या शांत स्वभाव के होते हैं।

 

2. पोषण (Nurture) का दृष्टिकोण

पोषण के समर्थक यह मानते हैं कि बाल विकास मुख्य रूप से पर्यावरण, शिक्षा, पालन-पोषण और अनुभवों का परिणाम होता है।

मुख्य तर्क:

  • बच्चा जन्म के समय एक कोरी स्लेट (Tabula Rasa) होता है।
  • सीखना और प्रशिक्षण विकास को आकार देते हैं।
  • सामाजिक एवं सांस्कृतिक वातावरण का गहरा प्रभाव पड़ता है।

समर्थक विचारक:

  • जॉन लॉक
  • बी. एफ. स्किनर

उदाहरण:

  • शिक्षा द्वारा बुद्धि का विकास।
  • अच्छे पारिवारिक वातावरण से व्यक्तित्व का निर्माण।

 

3. प्रकृति और पोषण का समन्वय

आधुनिक मनोवैज्ञानिक यह मानते हैं कि बाल विकास न तो केवल प्रकृति का परिणाम है और न ही केवल पोषण का, बल्कि दोनों की पारस्परिक क्रिया से विकास होता है।

उदाहरण:

  • बुद्धि का स्तर वंशानुगत हो सकता है, पर उसका विकास शिक्षा और वातावरण से होता है।
  • संगीत प्रतिभा जन्मजात हो सकती है, पर अभ्यास से निखरती है।

 

निष्कर्ष

अतः यह स्पष्ट है कि बाल विकास में प्रकृति और पोषण दोनों का महत्वपूर्ण योगदान है। संतुलित विकास के लिए दोनों का समन्वय आवश्यक है।

 

 

2. निरंतरता बनाम असततता

भूमिका

बाल विकास के संदर्भ में यह एक महत्वपूर्ण विवाद का विषय रहा है कि विकास निरंतर होता है या असतत (चरणबद्ध)। इस आधार पर दो प्रमुख दृष्टिकोण सामने आते हैं—निरंतरता और असततता।

1. निरंतरता (Continuity) की अवधारणा

निरंतरता का सिद्धांत यह मानता है कि बाल विकास एक धीमी, क्रमिक एवं सतत प्रक्रिया है। इसमें विकास छोटे-छोटे परिवर्तनों के माध्यम से होता है और इसमें कोई अचानक परिवर्तन नहीं होता।

मुख्य विशेषताएँ:

  • विकास क्रमिक रूप से होता है।
  • बालक और वयस्क के व्यवहार में केवल मात्रा का अंतर होता है, गुण का नहीं।
  • पर्यावरण, अनुभव और अभ्यास का विकास में महत्वपूर्ण योगदान होता है।

समर्थक मनोवैज्ञानिक:
जॉन लॉक, बी. एफ. स्किनर

उदाहरण:
भाषा विकास, शारीरिक वृद्धि (लंबाई और वजन) निरंतर विकास के उदाहरण हैं।

 

2. असततता (Discontinuity) की अवधारणा

असततता का सिद्धांत यह मानता है कि बाल विकास विशिष्ट चरणों में होता है, जहाँ प्रत्येक चरण पिछले चरण से गुणात्मक रूप से भिन्न होता है।

मुख्य विशेषताएँ:

  • विकास चरणबद्ध होता है।
  • प्रत्येक चरण की अपनी विशेषताएँ होती हैं।
  • एक चरण से दूसरे चरण में अचानक परिवर्तन दिखाई देता है।

समर्थक मनोवैज्ञानिक:
जीन पियाजे, सिगमंड फ्रायड, एरिक एरिक्सन

उदाहरण:
पियाजे के संज्ञानात्मक विकास के चरण तथा फ्रायड के मनो-यौन विकास के चरण।

 

निष्कर्ष:

बाल विकास में निरंतरता एवं असततता दोनों का महत्व है। कुछ क्षेत्रों में विकास निरंतर होता है, जबकि कुछ क्षेत्रों में यह चरणबद्ध रूप से होता है। अतः बाल विकास को समझने के लिए दोनों दृष्टिकोणों को अपनाना आवश्यक है।

 

 

 

3. विषय: बाल विकास में सार्वभौमिकता बनाम संदर्भ-विशिष्टता

 

भूमिका

बाल विकास के अध्ययन में यह प्रश्न महत्वपूर्ण है कि क्या बच्चों का विकास सभी संस्कृतियों और समाजों में समान रूप से (सार्वभौमिक) होता है या फिर यह सांस्कृतिक, सामाजिक और पर्यावरणीय संदर्भ के अनुसार बदलता है। इसी को सार्वभौमिकता बनाम संदर्भ-विशिष्टता का विवाद कहा जाता है।

 

1. सार्वभौमिकता (Universality) का दृष्टिकोण

इस दृष्टिकोण के अनुसार बाल विकास के कुछ नियम और क्रम सभी बच्चों में समान होते हैं, चाहे वे किसी भी संस्कृति या समाज से हों।

मुख्य तर्क:

  • विकास के चरण सभी बच्चों में समान होते हैं।
  • जैविक परिपक्वता विकास का आधार होती है।
  • संस्कृति का प्रभाव सीमित होता है।

समर्थक मनोवैज्ञानिक:
जीन पियाजे, सिगमंड फ्रायड

उदाहरण:
चलना, बोलना, बैठना जैसे विकासात्मक मील के पत्थर सभी बच्चों में पाए जाते हैं।

 

2. संदर्भ-विशिष्टता (Context-Specific) का दृष्टिकोण

इस दृष्टिकोण के अनुसार बाल विकास संस्कृति, सामाजिक वातावरण, पालन-पोषण और शिक्षा पर निर्भर करता है और हर समाज में भिन्न हो सकता है।

मुख्य तर्क:

  • विकास सांस्कृतिक अनुभवों से प्रभावित होता है।
  • सीखने के तरीके समाज के अनुसार बदलते हैं।
  • एक ही उम्र के बच्चों में विभिन्न समाजों में भिन्न व्यवहार देखने को मिलता है।

समर्थक मनोवैज्ञानिक:
लेव वाइगोत्स्की

उदाहरण:
भाषा, सामाजिक व्यवहार और नैतिक मूल्यों का विकास संस्कृति के अनुसार अलग-अलग होता है।

 

निष्कर्ष

अतः यह कहा जा सकता है कि बाल विकास में कुछ पहलू सार्वभौमिक होते हैं, जबकि कुछ संदर्भ-विशिष्ट। इसलिए बाल विकास को समझने के लिए दोनों दृष्टिकोणों को साथ-साथ समझना आवश्यक है।

 

 

4. विषय: बाल विकास में सक्रियता बनाम निष्क्रियता

 

भूमिका

बाल विकास के क्षेत्र में यह एक महत्वपूर्ण प्रश्न है कि क्या बच्चा अपने विकास में सक्रिय भूमिका निभाता है या वह केवल पर्यावरण के प्रभावों को निष्क्रिय रूप से ग्रहण करता है। इसी प्रश्न के आधार पर सक्रियता बनाम निष्क्रियता का विवाद उत्पन्न हुआ है।

 

1. सक्रियता (Activity) का दृष्टिकोण

इस दृष्टिकोण के अनुसार बच्चा अपने विकास में स्वयं सक्रिय भूमिका निभाता है। वह अपने अनुभवों के माध्यम से सीखता है और वातावरण के साथ अंतःक्रिया करता है।

मुख्य तर्क:

  • बच्चा जिज्ञासु होता है और स्वयं सीखता है।
  • सोच, समस्या-समाधान और निर्णय में बच्चा सक्रिय रहता है।
  • विकास आत्म-निर्माण की प्रक्रिया है।

समर्थक मनोवैज्ञानिक:
जीन पियाजे, लेव वाइगोत्स्की

उदाहरण:
खेल के माध्यम से सीखना, स्वयं प्रश्न पूछकर ज्ञान अर्जित करना।

 

2. निष्क्रियता (Passivity) का दृष्टिकोण

इस दृष्टिकोण के अनुसार बच्चा विकास की प्रक्रिया में निष्क्रिय होता है और उस पर पर्यावरण, प्रशिक्षण और अनुशासन का प्रभाव पड़ता है।

मुख्य तर्क:

  • बच्चा बाहरी उत्तेजनाओं पर प्रतिक्रिया करता है।
  • सीखना अनुकरण और अभ्यास पर आधारित होता है।
  • वातावरण बच्चे के व्यवहार को आकार देता है।

समर्थक मनोवैज्ञानिक:
जॉन लॉक, बी. एफ. स्किनर

उदाहरण:
पुरस्कार और दंड के माध्यम से व्यवहार में परिवर्तन।

 

निष्कर्ष

आधुनिक मनोविज्ञान यह मानता है कि बाल विकास में सक्रियता और निष्क्रियता दोनों की भूमिका होती है। बच्चा कुछ परिस्थितियों में सक्रिय होता है और कुछ में पर्यावरण से प्रभावित होता है। अतः दोनों दृष्टिकोणों का संतुलन आवश्यक है।

 

5. विषय: बाल विकास में स्थिरता बनाम परिवर्तन

 

भूमिका

बाल विकास के अध्ययन में यह एक महत्वपूर्ण प्रश्न है कि बचपन में पाए जाने वाले गुण और व्यवहार जीवनभर स्थिर रहते हैं या समय के साथ उनमें परिवर्तन होता है। इसी को स्थिरता बनाम परिवर्तन का विवाद कहा जाता है।

 

1. स्थिरता (Stability) का दृष्टिकोण

स्थिरता के अनुसार बाल्यावस्था में विकसित गुण जैसे बुद्धि, स्वभाव और व्यक्तित्व आगे चलकर भी बने रहते हैं।

मुख्य तर्क:

  • प्रारंभिक अनुभव जीवन पर दीर्घकालिक प्रभाव डालते हैं।
  • व्यक्तित्व के मूल गुण बचपन में ही तय हो जाते हैं।
  • विकास में निरंतरता बनी रहती है।

समर्थक मनोवैज्ञानिक:
सिगमंड फ्रायड

उदाहरण:
बचपन में आक्रामक बच्चा आगे चलकर भी आक्रामक स्वभाव का हो सकता है।

 

2. परिवर्तन (Change) का दृष्टिकोण

इस दृष्टिकोण के अनुसार बाल विकास में समय, अनुभव और वातावरण के साथ परिवर्तन संभव है।

मुख्य तर्क:

  • शिक्षा और सामाजिक अनुभव व्यवहार को बदल सकते हैं।
  • व्यक्तित्व लचीला होता है।
  • जीवन के विभिन्न चरणों में नया विकास संभव है।

समर्थक मनोवैज्ञानिक:
एरिक एरिक्सन, अल्बर्ट बंडूरा

उदाहरण:
संकोची बच्चा उचित वातावरण में आत्मविश्वासी बन सकता है।

 

निष्कर्ष

आधुनिक मनोविज्ञान यह मानता है कि बाल विकास में कुछ गुण स्थिर रहते हैं, जबकि कुछ में परिवर्तन संभव है। अतः स्थिरता और परिवर्तन दोनों का संतुलन बाल विकास को समझने के लिए आवश्यक है।

 


Developmental Tasks and Challenges

Introduction

Developmental tasks वे शारीरिक, संज्ञानात्मक, सामाजिक और भावनात्मक अपेक्षाएँ हैं जिन्हें प्रत्येक आयु-चरण पर बच्चे को पूरा करना होता है। इन कार्यों को सफलतापूर्वक पूरा न करने पर विकासात्मक चुनौतियाँ (Challenges) उत्पन्न होती हैं। विद्यालय इन कार्यों की पूर्ति में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है।

 

1. Foundational Stage (Age: 3–8 years)

(Pre-school to Grade 2)

Developmental Tasks

  • शारीरिक समन्वय (चलना, दौड़ना, लिखने की तैयारी)
  • भाषा विकास और संप्रेषण कौशल
  • मूल सामाजिक व्यवहार (साझा करना, सहयोग)
  • आत्म-नियंत्रण और भावनाओं की पहचान
  • सीखने में रुचि का विकास (Play-based learning)

Major Challenges

  • भाषा और संज्ञानात्मक विकास में असमानता
  • ध्यान अवधि (attention span) कम होना
  • घर और स्कूल वातावरण में अंतर
  • भावनात्मक असुरक्षा और अलगाव की चिंता

 

2. Preparatory Stage (Age: 8–11 years)

(Grade 3 to 5)

Developmental Tasks

  • मूल शैक्षणिक कौशल (पठन, लेखन, गणना)
  • तार्किक सोच का विकास
  • समूह में कार्य करना
  • आत्म-विश्वास का विकास
  • नियमों और अनुशासन की समझ

Major Challenges

  • सीखने की कठिनाइयाँ (Learning gaps)
  • तुलना और प्रतिस्पर्धा से आत्मसम्मान में कमी
  • परीक्षा-भय की शुरुआत
  • शिक्षक-केंद्रित शिक्षण से सहभागिता की कमी

 

3. Middle School Stage (Age: 11–14 years)

(Grade 6 to 8)

Developmental Tasks

  • अमूर्त चिंतन की शुरुआत
  • पहचान (Identity) की खोज
  • सहपाठी समूह का महत्व
  • नैतिक मूल्यों का विकास
  • आत्मनिर्भरता की ओर बढ़ना

Major Challenges

  • शारीरिक और हार्मोनल परिवर्तन
  • भावनात्मक अस्थिरता
  • Peer pressure
  • अकादमिक अपेक्षाओं में वृद्धि
  • आत्म-संदेह और भ्रम

 

4. Secondary School Stage (Age: 14–18 years)

(Grade 9 to 12)

Developmental Tasks

  • स्पष्ट आत्म-परिचय (Self-identity)
  • करियर और भविष्य की योजना
  • निर्णय लेने की क्षमता
  • सामाजिक जिम्मेदारी
  • भावनात्मक परिपक्वता

Major Challenges

  • परीक्षा तनाव और करियर दबाव
  • माता-पिता और शिक्षकों से संघर्ष
  • जोखिमपूर्ण व्यवहार (Risk-taking)
  • डिजिटल व्यसन
  • मानसिक स्वास्थ्य संबंधी समस्याएँ

 

Role of School and Principal

  • Child-centric and inclusive environment
  • Guidance & counselling services
  • Life skills education
  • Teacher sensitization
  • Parent–school partnership

 

Conclusion

प्रत्येक विद्यालयी चरण की अपनी विकासात्मक आवश्यकताएँ और चुनौतियाँ होती हैं। एक प्रभावी विद्यालय नेतृत्व (Principal) का दायित्व है कि वह विकासात्मक कार्यों की पूर्ति हेतु अनुकूल वातावरण उपलब्ध कराए और बच्चों की चुनौतियों को समय रहते संबोधित करे।

 


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